Friday, 9 September 2016

"रक्षा" बंधन पर स्नेह वितरित हुआ




"रक्षा" बंधन पर स्नेह वितरित हुआ
बहनों के आशीष से मन हर्षित हुआ
पूज्य श्री का पावन सानिध्य साथ में
सबकुछ पवित्र अंतर्मन सहित हुआ
"रक्षा" बंधन पर स्नेह वितरित हुआ!!
बहनों की न कोई "मांग" थी,
बस स्नेह पूरित ये छलांग थी
रोली, चन्दन और रक्षा सूत्र था
तृप्ति में डूबी "गीली" आँख थी
भरी कलाई देखकर, मैं भी पुलकित हुआ
"रक्षा" बंधन पर स्नेह वितरित हुआ
श्रद्धामय वातावरण आहा! उदात्त था
मेरे मस्तक पर देखो बहनों का हाथ था
बंद आँखों से सौ सौ प्रणाम किये
हाँ! ये "रक्षा" का पावन मूक संवाद था
स्नेह ही स्नेह था, अहंकार तिरोहित हुआ
"रक्षा" बंधन पर स्नेह वितरित हुआ

बचपन से लेकर आजतक!



बचपन से लेकर आजतक!
मैं क्या क्या न हुआ, मैंने क्या क्या मुकाम न छुआ
मैंने डर को "डराया", मैंने दर्द भी बांटा जो था पराया
बचपन की फुंहारे चूमती हैं मस्तक
बचपन से लेकर आजतक!!
एक भाव में जिया, मैं जलता, बुझता सा दिया
लिए घूमता फिरता रहा, कहता रहा कुछ अनकहा!
जो खुद मैं न समझा अब तलक!
बचपन से लेकर आजतक!!
पता नहीं मैं क्या चाहता था? न जाने मैं क्या नापता था?
अपने कदमो से किस ओर चला! ये भी कौन जाने भला?
राहगीर था जो राह गया था भटक!
बचपन से लेकर आजतक!!
भटकी राह में मिलता है, कोई जब पूण्य खिलता है
उंगली पकड़ पार लगाता है, कोई जब अश्रु धार बहाता है
फिर किस्मत पर नहीं रोता है साधक!
बचपन से लेकर आजतक!!

विचार प्रवाह

चालबाज होने से हमारी सम्पूर्ण कोशिश रहती है कि कैसे दूसरों को पटखनी दें, अर्थात हमारे भीतर द्वेष प्रबल रूप से उफान लेने लगता है। यह प्रक्रिया इतनी गुपचुप तरीके से हमें घेर रही होती है कि इसका पता लगना आसान नहीं होता। हम बिखरने लग जाते हैं, हम कम होने लग जाते हैं और सामान्य सी शांति जो सहज उपलब्ध है वो भी हमसे छिन जाती है। इस चक्र से बाहर निकलने का एक ही मार्ग है वो है सबसे प्रेम व प्रीति पूर्वक व्यव्हार करना, कठिन है साधना पथ पर सूक्ष्म साधना की अवस्था इसकी प्राप्ति सुगम बना देती है। इस एक उपाय में सारे उप-उपाय समाहित हैं। चालबाज नहीं हम प्रेम,प्रीति का आगाज़ बनें।

*********************************************************************************
क्या कोई कभी पूर्ण सत्य बोलने का साहस कर सकता है? पूर्ण सत्य से मेरा आशय है-सबकुछ जो भी अशुभ किया है और आगे से शुभ ही करेगा इस भावना से उघाड़ा गया सत्य!
पूर्ण सत्य:-अपनी प्रतिष्ठा, मान, सम्मान, उपाधि से विरत होकर वाणी को मुक्तहस्त बोलने देना, खोलने देना वो दबे राज जो खुद से भी अनजाने से रहे हैं अबतक!
कोई ऐसा कर ले,तभी पूर्ण निर्भार हो कर सत्य में प्रतिष्ठित हो सकता है, नहीं तो उसका व्यक्तित्व खंड खंड होकर उसे टुकड़ों टुकड़ों में तोड़ देगा!
में कभी कर पाउँगा ऐसा साहस? कठिन है पर मेरे हृदय की तीव्र अभीप्सा है..
**********************************************************************************************************************************

प्रभु चिंतन तू कर ले बन्दे

प्रभु चिंतन तू कर ले बन्दे
अंत समय आएगा काम
बंकि सब तो व्यर्थ है जग में
एक सार्थक है प्रभु का नाम
प्रभु चिंतन..................
प्रभु-महिमा को जी ले, गा ले
भक्ति-शक्ति पायेगा
कर सफल इस जीवन को तू
मोक्ष परम पद पायेगा
मोक्ष ही है तेरा अंतिम धाम
प्रभु चिंतन तू कर ले बन्दे
अंत समय आएगा काम
अनुपम श्रद्धा, उत्कण्ठ भक्ति
ये दोनों हैं भक्त की शक्ति
कर धारण इनको जीवन में
बिना इनके न मिलती है मुक्ति
इसी जीवन में, तुझको होना है अकाम
प्रभु चिंतन तू कर ले बन्दे
अंत समय आएगा काम
सौंप दे सबकुछ उस एक परम को
सौंप दे अपनी तू पहचान
कर्ता-धर्ता दाता वही है
उसका ही है सब कर्म विधान
सब शास्त्रों का एक पैगाम
प्रभु चिंतन तू कर ले बन्दे
अंत समय आएगा काम
दिव्य कर्म तू करता चला जा
फल को करदे "मदर्पण" तू
परम के चरणों की रज बन जा
कर दे खुद को पूर्ण समर्पण
कृष्ण भी तू ही, तू ही राम
प्रभु चिंतन तू कर ले बन्दे
अंत समय आएगा काम

गुरुवर तुम सहज-सरल हो!




कभी हम शिष्यों के बनते उत्तर
कभी हमें ही सुनते हो गुरु-प्रवर
पास बैठाकर कृपा बरसाते
बरसाते हो आनंद प्रखर!
तुम ध्यान की प्रथम पहल हो
गुरुवर तुम सहज-सरल हो!

बरबस ज्ञान की बदली बनकर
निर्भार बरसते निर्झर-निर्झर
कहीं फिर कोई बीज है उगता
वृक्ष बनकर वह छूता ध्यान-शिखर
खिलती कली सी, उगती कोपल हो
गुरुवर तुम सहज-सरल हो!
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
सत्कर्म, सहजता के तुम प्रवाह हो
ध्यान में स्थित वह शाश्वत ठहराव हो
कलकल-अविरल बहता जीवन
समस्त अशुभ का तुम अभाव हो
तुम शांत गहरे सागर के तल हो
गुरुवर तुम सहज-सरल हो!
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
गुरु-सखा या तात् कहूँ मैं
गुरु-शिष्य पावन संवाद कहूँ मैं
सजल नेत्र और उदार हृदय से
बस यही एक बात कहूँ मैं
आनंद बरसाते बादल हो
गुरुवर तुम सहज-सरल हो!



तू अनंत का राही तू रुकना मत!


तुझे धूप भी रोकेगी, तुझे छाँव भी रोकेगी
कभी कभी मायूसी भी तेरे संग संग हो लेगी
पर तू अछूता रहकर भी ठहरना मत
तू अनंत का राही तू रुकना मत!
तुझे क्रोध भी सतायेगा, तुझे लोभ भी लुभाएगा
राग और द्वेष भी आँख पर अंधी-पट्टी फहराएगा
पर तू काम की अग्नि में दहकना मत
तू अनंत का राही तू रुकना मत!
तुझे अभाव भी नोचेंगे, कुछ लोग ऐसा भी सोचेंगे
तू दर्द में है ये कहकर आंसू भी नहीं पोछेंगे
सजल नेत्रो से भी राह धूमिल करना मत
तू अनंत का राही तू रुकना मत!
तुझे माया भी घेरेगी, अपनी जादुई छटा बिखेरेगी
कभी कोई दबी कुचली कुंठा अपना बदला लेगी
इन सब झंझावातों के बीच फफकना मत
तू अनंत का राही तू रुकना मत!
तू अनंत का
राही तू रुकना मत!

Sunday, 14 August 2016

रात के पौने 2 बजे हैं।



रात के पौने 2 बजे हैं।










सब सोये हुए लगते हैं, बस एक झींगुर मेरा साथ दे रहा है।
बताते हुए थकता ही नहीं है कि "वो" मेरा साथ दे रहा है।
अरे हाँ! एक पंखा भी है जो मेरे ऊपर मंडरा रहा है
खतरे की तरह नहीं!!!! ठंडक बनकर छितरा रहा है
रात्रि की आरामदायक "गोदी" है
पर आज ये निंदिया की विरोधी है
आज इसके आगोश में खुले हाथ, बंद नहीं होते
चलो रोज हुआ सोना, आज हम भी नहीं सोते
इतना सुनते ही "कोई कहीं" मुस्काया है
रात के पौने 2 बजे हैं।

कभी जगे थे कुलबुलाहट से
कभी जगे थे घबराहट से
कभी जगे थे निंदिया की "आहट" से
पर आज का जगना तो रोएँ रोएँ की मांग है
शायद "दर्द", के पार जाने की कोशिश, छलांग है।
लिखते लिखते "छोटी" ने डांट लगाई होगी
यही- कि रात के पौने 2 बजे हैं (सो जाओ)

मैं "वक़्त" होना चाहता हूँ।

 काल के कपाल पर सब अंकित हुआ
बुरा,भला, उदासीन सब टंकित हुआ
युग, मन्वन्तर, संवत्सर तक सब
इसके गर्भ में पुष्पित, पल्लवित हुआ।
क्षण,पल, "अहोरात्र" का बीज बोना चाहता हूँ
मैं "वक़्त" होना चाहता हूँ।
मैं क्रांति, शांति और विश्रांति का आश्रय होऊं
निर्जन वन की मूकता का "नवनीत" बिलोउं
गीता के उपदेश को भी "वक़्त" मुहैया कराकर
रणभूमि में अर्जुन बनकर निज शोक को धोऊं
मैं "पाञ्चजन्य" की गूंज को पिरोना चाहता हूँ
मैं "वक़्त" होना चाहता हूँ।
नदी किनारे ऋषियों के एकांत का साक्षी
वैदिक वाङ्गमय और वेदांत का साक्षी
उस दिव्य परिवेश की फिंजाओं में घुलकर
वैदिक युग के सर्वोच्च दर्शन का आकांक्षी
अपने में वेद, दर्शन, उपनिषद् संजोना चाहता हूँ
मैं "वक़्त" होना चाहता हूँ।

नब्बू "एक गुजरा अनुभव(बासी)!

अदम्य साहसी, संकल्प से लबालब
स्वयं में निमग्न, "नब्बू" रहता था तब!
गुलाटी मारता, वह कहीं टिकता था कब?
समझ का पर्याय, आनंद का सबब!
इतने विशेषणों के बाद और क्या कह दूँ
हाँ! कुछ ऐसा ही था नब्बू!
ऊँचे पेड़ों पर चढ़, टीवी के सिग्नल्स पकड़ता
लिये गाय को चराने, जंगल को चल पड़ता
ऊँचे टीले के मस्तक पर टाँगे फैलाये,
खुद से सुलझता, और खुद से झगड़ता
भरी भीड़ में होता खुद से रूबरू
हाँ! कुछ ऐसा ही था नब्बू!
अँधेरी रातों में सफ़र करता था
डर के "डर" को बेअसर करता था
मैंने महसूस की हैं उसकी "बेख़ौफ़ सांसे",
जब अपने पे आता था, ग़दर करता था
भावों को शब्दों से कैसे शक्ल दूँ
हाँ! कुछ ऐसा ही था नब्बू!!

स्वतंत्रता का मूल!

स्वतंत्रता का मूल! फाँसी के फंदो पर झूमते, झूलते कन्धे
आतताइयों की गोली के शिकार "आज़ाद" परिन्दे
दबे, कुचले गए माँ भारती के समर्थन में स्वर
या- दूर भारत की सीमा से पार, वो हुंकार प्रखर
जिसकी प्रतिध्वनि आज रही है फल-फ़ूल
हाँ! यही तो है स्वतंत्रता का मूल!!
कितने नाम लूँ! कि कहीं बेईमानी न हो
उनके भाव अमर हों! भले ही मेरी वानी न हो
उनका हर वो स्वर, जिसने वंदे मातरम् गाया हो
आकाश में "शब्द" बनकर, पुरे देश में मंडराया हो
बन "शब्द-बाण" फिर जो बन गया घातक शूल
हाँ! यही तो है स्वतंत्रता का मूल!
स्वतंत्रता समर के कई ओर-छोर रहे होंगे
गुलामी के बादल भी कितने घनघोर रहे होंगे
फिर क्रांति-टोला बनकर सूरज निकला होगा
धधका होगा स्वयं तपकर, तब फिर मौसम उजला होगा
"स्वाधीन-रश्मि" ने कली खिलाई, ख़त्म हुआ अंग्रेजी रूल
हाँ! यही तो है स्वतंत्रता का मूल!
"खून और आज़ादी" का सम्बन्ध क्या होता है?
" स्वदेशी से स्वालंबी भारत" का सपना कौन संजोता है?
जब "मुट्ठीभर बंदूकें" बोई जाती हैं
"भूख-प्यास" में दिन तो रातें सोई जाती हैं
भूलें जितनी पहले की हैं, अब न करेंगे कोई भूल \
हाँ! हां! यही तो है स्वतंत्रता का मूल!

  वंदे मातरम्! वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!